शिखरधाम पर विराजमान लोकदेवता भीलट देव: हरदा के रोलगांव से नागलवाड़ी तक आस्था की गाथा

Anand Sarvare

06/09/2025

धर्म डेस्क। नागलवाड़ी के श्री भिलट देव का जन्म स्थान मध्य प्रदेश के हरदा जिले के रोलगांव पाटन में हुआ था, जहाँ वे गवली परिवार में जन्म लिया था। यह माना जाता है कि शिव-पार्वती की कृपा से उनका जन्म हुआ था और वे नागदेवता के अवतार के रूप में पूजे जाते हैं।

सतपुड़ा पर्वत श्रंखलाओं की हरी भरी वादियों में मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में स्थित राजपुर तहसील के नागलवाड़ी गांव में नागदेवता को समर्पित सैकड़ों साल पूराने और प्रसिद्ध मंदिर श्री भीलट देव शिखरधाम की महिमा स्थानीय लोगों में ही नहीं बल्कि देश और दुनियाभर के लोगों के लिए अपरंपार है। सैकड़ों वर्षों से यह तीर्थ शिखरधाम के नाम से प्रसिद्ध है। हर साल यहां नागपंचमी के विशेष अवसर पर लाखों लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। शिखरधाम के चारो और बहुत सुंदर प्राकृतिक मनोरम दृश्य है। जो यहां आने वाले लोगो का मन मोह लेती है।

भीलट देव का जन्म परिचय-

भीलट देव लोकदेवता है जो लोगो की मन्नतों को पूरा करते हैं उन्हे जीवन में सुरक्षा प्रदान करते है। लोक मान्यताओ के अनुसार बाबा भीलट देव का जन्म नागपंचमी के दिन आज से लगभग 855 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के हरदा जिले में माचक नदी किनारे स्थित रोलगांव पाटन के एक गवली परिवार में हुआ था। 

उनकी माता का नाम मेंदाबाई व पिता का नाम रेव जी गवली था। भीलट देव के माता-पिता एक मध्यम वर्गिय परिवार से संबंध रखते थे और दोनों ही भगवान शिव के परम भक्त माने जाते थे। शिव के परम भक्त होने के बाद भी इनके घर कोई संतान नहीं थी। ऐसे में उन्होंने सोचा कि शायद उनकी भक्ति में कहीं चूक हो गई होगी इसलिए उन्होंने और अधिक कठोर तपस्या की।

इतनी कठोर तपस्या और साधना से प्रसन्न होकर भोलेनाथ और माता पार्वती ने उन्हें वरदान के रूप में एक सुंदर बाल का आशीर्वाद दिया। माता-पिता ने प्यार से उस बालक का नाम भीलट रखा। लेकिन साथ ही माता मेंदाबाई व पिता रेव जी से यह भी वचन लिया कि हम लोग प्रतिदिन तुम्हारे घर पर भिक्षा मांगने आया करेंगे। और यदि किसी भी दिन आप लोगों ने हमें या इस बाालक को अनदेखा किया तो फिर हम इस बालक को अपने साथ ले जाएंगे। कहा जाता है कि भीलट देव ने बचपन से ही अपनी चमत्कारिक लीलाओं से परिवार व ग्रामवासियों को आश्चचर्यचकित कर दिया था।

किंवदंतियों के अनुसार, एक दिन भीलट देव के माता-पिता शिव-पार्वती को दिए अपने वचन को भूलकर भक्ति में लग गए। तभी भगवान शिव ने बालक को पालने में से उठाया और उसके स्थान पर अपने गले के नाग को वहां रख कर बालक को अपने साथ लेकर चले गए। इधर, पालने में अपने बालक भीलट देव को न पाकर उसके स्थान पर नाग देवता को देखकर भीलट देव के माता-पिता समझ गए कि हमसे भूल हो गई है। ऐसे में उन्होंने एक बार फिर से शिव-पार्वती की आराधना की। तब शिव-पार्वती ने कहा कि हमारे वचन अनुसार आप ने हमें पहचाना नहीं इसलिए अब हम खुद ही इस बालक की शिक्षा-दीक्षा करेंगे और उस पालने में हमने जो नाग छोड़ा है, उसकी पूजा अब तुम भीलट देव और नाग देव दोनों ही रूपों में करोगे। कहा जाता है कि तभी से यहां भीलट देव और नाग देव दोनों ही की पूजा एक साथ की जाने लगी है।

भीलट देव की शिक्षा दीक्षा-

यहां प्रचलित एक अन्य दंतकथा के अनुसार भगवान शिव के अवतार माने जाने वाले भगवान भैरवनाथ ने स्वयं पचमढ़ी के चैरागढ़ क्षेत्र में उस बालक भीलट देव का लालन-पालन किया। उन्हीं के मार्गदर्शन में शिक्षा-दीक्षा अर्जित कर तंत्र-मंत्र और युद्ध की समस्त कलाओं में दक्ष होकर भीलट देव ने भैरवनाथ के साथ मिलकर भगवान भोलेनाथ की इच्छा के अनुसार बंगाल क्षेत्र में स्थित कामख्या देवी मंदिर के आस-पास के घने जंगलों का रुख किया और वहां के कुछ खास जादूगरों से हूनर भी सीखे।

बंगाल में रहकर भीलट देव ने बंगाल की राजकुमारी राजल से विवाह भी किया और भगवान भोलेनाथ और पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त किया। तब जाकर भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती ने कहा कि अब तुम अपने माता-पिता के पास जाओ और वहां से नागलवाड़ी के पास सतपुड़ा शिखर चोटी पर अपना निवास बनाओ और लोगों का कल्याण करो। नागलवाड़ी में तुम सदैव भीलट नाग देवता के रूप में पूजे जाओगे। तभी से भीलट देव ने अपनी तपस्या स्थली और कर्मभूमि दोनों ही के लिए सतपुड़ा की इस ऊंची पहाड़ी के शिखर को चुना। कहा जाता है कि तभी से भीलट बाबा नागलवाड़ी से 4 किमी की दूरी पर सतपुड़ा के शिखर धाम पर मौजूद हैं।

बाबा भिलट देव के चमत्कार-

उनकी तंत्र शिक्षा को लेकर भी कई किस्से और कहानियां प्रचलित हैं। मान्यता है कि अपनी तांत्रिक शक्तियों को आजमाने के लिए बाबा भीलट देव ने अपने गुरू भैरवनाथ जी के सहयोग से कई तांत्रिकों और ओझाओं को पराजित कर अपना लोहा मनवाया था।

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